सोमवार, 8 अगस्त 2016

पंखेरू आस के

पंखेरू आस के सारी उमंगें छोड़  क्यों आये
निराशाओं के बहकाये हुए से लोट क्यों आये।।
कल्पनाएँ धरातल से जहां मिलती सी लगाती हैं,
वहां क्षितिज के होने का भरम था तौड क्यों आये
घुमक्कड़ मेघ देखा तो संजोये स्वप्न तृप्ति के ,
नदी के घाट तक भरने गए घट फोड़ क्यों आये
जिन्हें यादों की देहरी से था बिसराया युगों पहले,
उन्हीं भूले सम्बन्धों को दुबारा जोड़ क्यों आये
किसी निर्जन मरूस्थल में कोई संतप्त मन जांगिड
परस्पर दे रहे थे सांत्वना झंझोड़ क्यों आये


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