सोमवार, 8 अगस्त 2016

छंद : प्रिय छंद
बारह वर्ण बीस मात्राएँ
सूत्र : राजभा राजभा राजभा राजभा
ले गया चोर क्या क्या चुरा ले गया ।
लो फकीरों तुम्हारी मता ले गया । ।
गो ग़ज़ल शेर मिशरे चुराते सुने ,
वो समूंचा मुज़ल्ला चुरा ले गया ।
सरपरस्ती सियासत की है हासिल उसे ,
ना तभी तो खुदा से डरा ले गया ।
चोर पकड़ा गया था रंगे हाथ जो ,
वो बड़ा चोर आ के छुड़ा ले गया ।
काम की चीज थी या बिना काम की,
हाथ जो भी लगा वो उठा के गया ।
वो मुहाफ़िज़ अँधेरे का था शर्तिया ,
आखिरी रोशनी की शुआ ले गया ।
एक मफरूर से  लापता आदमी,
मांग के वो पता क्यों नया ले गया
तखलीक,तखईल और नजरियात,
पास मेरे यही था बचा ले गया                                
उसे तेशो खंज़र ओ तलवार दे।                                                   
काट दे वक्त की बेड़ियाँ बेहिचक,                                                    
खूबसूरत दी तस्वीर तो शुक्रिया,                                                     
बह गया प्यार शुब्हा  ए सैलाब में,                                                 
तू  मुझे हल,कलम और औजार दे।
 मेरी लेखनी को तो वो धार दे।
 इसे टांकने को कहीं दीवार दे ।
किसी दिल को तो तुख्में एतबार दे ।
मैं परश्तिश करूं न करूं क्या हुआ.
मेरे हक तो मुझे ए तरफदार दे ।
ना मुझे रोज आना पड़े मांगने,
बस एक बार में ही मददगार दे।
खुद बी खुद खेंच लुंगा लकीरें तो मैं.                                                  
हथेली बिन लकीरों की इस बार दे ।                                      

छंद-प्रिय छंद

छंद-प्रिय छंद
बारह वर्ण बीस मात्रा
सूत्र -राजभा राजभ राजभा राजभा
दोष तो दूसरों का बताते रहे
देश की दुर्दशा को छिपाते रहे ।।
वोट देते  गए  और माथा  धुना ,
चूक  वो  ही  सदा  दोहराते रहे
साख थी पीढ़ियों की बची थी जरा ,
वो  उसी को हमेशा  भुनाते  रहे
मोहरे  भी  गए  पेदलें  ना बची , 
और  वो  मात पे मात खाते रहे
झोंपड़े  निर्धनों  के उठाके वहीं ,
कोठियां ये किलों सी बनाते रहे
योजनाएं  बनी  घोषणाएं  हुई ,
जाल ही आंकड़ों के बिछाते रहे
आज भी हैं गरीबी वहीं की वहीं ,
खोखले भाषणों से लुभाते रहे


पंखेरू आस के

पंखेरू आस के सारी उमंगें छोड़  क्यों आये
निराशाओं के बहकाये हुए से लोट क्यों आये।।
कल्पनाएँ धरातल से जहां मिलती सी लगाती हैं,
वहां क्षितिज के होने का भरम था तौड क्यों आये
घुमक्कड़ मेघ देखा तो संजोये स्वप्न तृप्ति के ,
नदी के घाट तक भरने गए घट फोड़ क्यों आये
जिन्हें यादों की देहरी से था बिसराया युगों पहले,
उन्हीं भूले सम्बन्धों को दुबारा जोड़ क्यों आये
किसी निर्जन मरूस्थल में कोई संतप्त मन जांगिड
परस्पर दे रहे थे सांत्वना झंझोड़ क्यों आये


बंट रहा बचपन से

बंट रहा बचपन से फिरता उखड़ा उखड़ा आदमी।
इस कदर टूटा हुआ हैं टुकड़ा टुकड़ा आदमी॥
रिश्ता अभिवादन से थोड़ा सा जरा आगे बढ़ा,
रूह से रूखा मिला वो चिकना चुपड़ा आदमी।
 पूर्वजों ने रीढ़ के बल उठाना था सीखा कभी ,
हो रहा हैं दिन दिन क्यों फिर से कुबड़ा आदमी।
परिवार की परिभाषा बीवी बच्चों तक महदूद हैं,
कर रहा हैं हद से ज्यादा, दिल को संकड़ा आदमी।
  मतलबी हैं या हैं कुछ मजबूरियां उसकी कोई,
झुकता हैं बौनों के आगे लम्बा तगड़ा आदमी।
  पाप ,पुण्, स्वर्ग का मोह नर्क का डर है उसे,

और धर्म की ब्रह्मपाश बैठा है जकड़ा आदमी।