गुरुवार, 24 मार्च 2016

सखी सच है

सखी सच है कि क्या होते हैं सच सब भौर के सपने
कि देखें मन मयूरी नृत्य करते मौर के सपने॥
जहां पर स्वर्ण मृग को हांफ कर रुकते हुए देखा,
अनाड़ी मन ने देखें हैं भला उस छौर के सपने।
मिले विरही के मन जैसा मरूस्थल जो युगों प्यासा,
वहां जम कर के बरसूं हैं घटा घनघोर के सपने।
चुरा कर के किसी का कुछ बने स्वामी वो बौराए,
धरोहर की ज्यूं उसे रखने के हैं इक चोर के सपने।
धड़क दिल धक् से रह जाये निहारूं एकटक उसको ,
बड़े अदभुद अनाड़ी  धड़कनों के शोर के सपने।
मुझे सपनों में जांगिडयूं किया करता चुहल कोई,

लगे हैं आजकल अपने से मुझको और के सपने। 

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