शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

एक क़लम बेखौफ हुई

एक क़लम बेखौफ हुई हैं हरदम आग उगलती हैं।
क़लम एक अंदर ही अंदर क्‍यों दिन रात सुलगती है॥
सोच समझ कर कहने वाले कब पूरा सच कहते हैं,
दिल की बात लबों पर आती हैं जब जुबां फिसलती है।
शब्‍द जाल कैसे भी बुनलो, घुमा फिरा कर बात कहो,
समझदार हैं दुनिया सारी जो भोली सी बनती है।
संसद में खुंर्रांट वकीलों की जब से तादाद बढ़ी,
तब से सच इंसाफ की खातिर हफ्‍तों अनशन करती है।
बिकी बिकायी क़लमों पर लिखने की जहमत कौन करे,
अपनी बदनामी के डर से हर इक क़लम झिझकती है।
कब लिखने बैठा था इसको,ग़ज़ल मुकम्‍मल आज हुई,
कहा दौर ने ‘जांगिड़' तेरी बात पुरानी लगती है।

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