रविवार, 19 अक्तूबर 2014

खरे मोती बनी जब जब बही बूंदें पसीने की

खरे मोती बनी जब जब बही बूंदी पसीने की।
ह़कों से रह गयी वंचित वहीबूंदी पसीने की॥
उचित हक़ दो इन्‍हें इनका नहीं सैलाब बन कर के,
डुबो देगी तेरी दूनिया यही बूंदें पसीने की।
इसे पूँजी व साम्‍यवाद ने मिल कर के लूटा है,
दिलासे ले के बस बहती रही बूंदे पसीने की।
हिमायत करने वाले सरनगूं होंगे नदामत से,
दिखादे खोल कर अपनी बही बूदें पसाने की।
ये संगो खिस्‍त से मिलके बने खालिक फसीलों की,
कभी फूलों की नकअत में छुपी बूंदें पसीने की।

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