बुधवार, 13 अगस्त 2014

क्‍या देखा क्‍या भोगा

क्‍या देखा क्‍या भोगा तुमने आकर दुनियादारी में।
 हाथ बंटाने वाले कम हैं दुखः की सांझेदारी में।
 हानि लाभ तलाशा जाता मदद के लेने देने में,
 रिश्‍ते रोग विहीन रहे ना स्‍वार्थ की बीमारी में।
 उसने उँचा मोल वसूला उसने वजन में कम तौला।
सब ने घाटा भरती करली अपनी अपनी बारी में।
 अतुल त्‍याग मां का बेटों ने कर्जा मान उतारा तो,
फटा पुराना मां का आँचल फफक पड़ा लाचारी में,
 रिश्‍तों का असतित्‍व बोध अब लेन देन से होता हैं,
लेनदेन क्‍या श्‍ोष भला रहता हैं टूटी यारी में।
 जीवन रुपी नाम नकल मत पन्‍ने बरबाद करो,
नहीं वसूली हो पायेगी बेचा अगर उधारी में।
 कृष्‍ण सुदामा का याराना इसी लिऐ मशहूर हुआ,
गर्जमंदको दे देने का सद्‌गुण था गिरधारी में

किसी ने फिर मुझे अपना कहा है

किसी ने फिर मुझे अपना कहा है I
 अभी भी कौन सा रिश्ता बचा है II
 समन्दर पर से अबके लिखा है '
 वहां भी कोई मुझाको जनता है I
न जाने क्या क्या पढ़ना चाहता है '
 मेरे खामोश चेहरा बांचता है I
 उसे पढ़ कर के यूं लगाने लगा है '
कोई मेरी तरह भी सोचता है I
कमाया नाम क्या उसने वो अब तक '
पते के पीछे पीछे भागता है I

मन मरूस्थल में गज़ब सूखा पड़ा है

मन मरूस्थल में गज़ब सूखा पड़ा है I
नेह का बादल अज़ब रूखा खड़ा है II
कोंध कर अम्बर से बिजली ने निहारा,
कौनसा दरख़्त यहाँ सबसे बड़ा है I
गर्म लगाती है ज़माने की हवा भी ,
हर जगह तहजीब का पहरा कड़ा है I
वो मसलने के लिए उद्द्यत खड़े थे ,
शाख से जब भी कोई गुंचा झाडा है I
रुक गए थे छांह ठंडी देख कर जब ,
तब यह जाना पांव में कांता गडा है I
चंद खुशियों की सजी महफ़िल थी लेकिन ,
मुश्किलों का अलहदा अपना धडा है I

बंट रहा बचपन से

बंट रहा बचपन से फिरता उखड़ा उखड़ा आदमी।
इस कदर टूटा हुआ हैं टुकड़ा टुकड़ा आदमी॥
 रिश्ता अभिवादन से थोड़ा सा जरा आगे बढ़ा,
 रूह से रूखा मिला वो चिकना चुपड़ा आदमी।
 पूर्वजों ने रीढ़ के बल उठने की कोशिश की,
 हो रहा हैं दिन ब दिन क्‍यों फिर से कुबड़ा आदमी।
 परिवार की परिभाषा बीवी बच्‍चों तक महदूद हैं,
कर रहा हैं हद से ज्‍यादा, दिल को संकड़ा आदमी।
 मतलबी हैं या हैं कुछ मजबूरियां उसकी कोई,
 झुकता हैं बौनों के आगे लम्‍बा तगड़ा आदमी।
 पाप ,पुण्‍य, स्‍वर्ग का मोह नर्क का डर है उसे,

 और धर्म की ब्रह्मपाश बैठा है जकड़ा आदमी।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

क्या क्या नाच नचाये कुर्सी

नाच    कई   नचावाए  कुर्सी /
कितनों को ललचाये कुर्सी //
नींद उसे फिर कब आती है /
गर थोड़ी सी हिल जाए कुर्सी //
फिर मिलना आसान नहीं है /
जो एक बार छिन जाए कुर्सी//
यूँ ही  सहज नहीं मिल जाती /
 सैण्डिल तक उठवाए कुर्सी//
कौन छौड़ना फिर चहेगा /
जिसको भी मिलजाए कुर्सी //