सोमवार, 17 मार्च 2014

देखता हूँ इन दिनों फिर लोग चिल्लाने लगे

देखता हूँ इन दिनों फिर लोग चिल्लाने लगे I
ये स्वर ललकार के कुछ जाने पहचाने लगे II
धन ने भी गिरगिट से सिखा है कोई हूनर जरुर,
धीरे   धीरे  रंग   इस के  सामने  आने   लगे I
फ़िक्र उनको मुल्क की होने लगी है आज फिर,
कुर्सी छिन जाने के डर से सायद घबराने लगे I
देश का पैसा अमानत मन रखवाले रहे ,
अख़बारों के आंकडे पढ़ अब वो पछताने लगे I
और कुछ खाने की कोई क्यों खबर आई नहीं ,
वि जुगाली ले रहें हैं या कि सुस्ताने लगे I
उनके झांसे में न आना वो बड़े मक्कार हैं,
बरी बरी आ के सारे  मुझको समझाने लगे I
जैसे भी मुमकिन हो सझोता करें हालात से ,
जो न ऐसा कर सके वो लोग दीवाने लगे I

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।
 और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥
 जब ये विरही के मन की तहों में गयी,
 तब गयी दौड़ पी के नगर लेखनी।
जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुना,
 तब सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।
हासिये तू भी सुर्खी तक आ सका ,
जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।
जो इतिहास लिख्‍खी थी तलवार ने,
 मिट गयी होती होती न गर लेखनी।
जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश है,
इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।
जो भी ढ़र्रे से हट के चली है कभी,
  हुई वो अमर दामोदर लेखनी।

रविवार, 2 मार्च 2014

निस्संदेह वो संभालेगा

निस्संदेह  वो  संभालेगा  इतना खोकर अबकी  बार  I
अच्छी खासी खा बैठा है फिर वो ठोकर अबकी बार II
पथराई    पलकों  में  पीड़ा   पढ़ने  वाले  पाठक   भी,
अपने दुखड़े व्यक्त करेंगे आखिर रोकर अबकी बार  I
मन का मैल यथावत रखने में वो कुशल हुआ इतना ,
कहता मन पर अंकित सब कुछ धोकर आया अबकी बार  I
कथा कआनत की कहते थे कभी मुज़स्स्म काबुल के ,
कर दी चकनाचूर पलों में वाही धरोहर अबकी बार  I
तेरा   तेरा   मेरा   मेरा   झगडा   सिर्फ   हमारा   है ,
बस  इतनी सी बात न समझे दाना होकर अबकी बार  I
मानवता की मूक मंत्रणा करते थे जो मुजस्समें ,
बामियान में पास पास ली वहो धरोहर अबकी बार  I
ये नपी तुली भाषा शब्दों को थोक पिंदकर देखा है ,
संबोधन बदले सहमे  से हैं 'दामोदर 'अबकी बार  I

छोटा सा कटोरा था उसका, दो मुठ्ठी ले भर आया हैं।

छोटा सा कटोरा था उसका, दो मुठ्ठी ले भर आया हैं।
 पर देख के मेरी झोली को, सर दाता का चकराया है॥
उन चाँद सितारों को पा कर ,इतराये वो भरमाये वो ,
रस्‍ते का रोड़ा मान जिन्‍हें,बहुधा हमने ठुकराया है।
दिल अंकबूत हैं सपनों, ताना बाना बनता रहता,
किसको दोष मढ़ें जिसने, इसमें हमको फंसवाया है।
चीखी थी हदें तानाजन कि, हद होती हैं लाचारी की,
कूवत होती हैं जिसमें वो,इक हद तक ही रुक पाया है।
जब भी खुदा से रुठा मैं, हर बार मनाने आया वो,
रुठा है खुदा उसका उससे,कर अरदासें उकताया है।
 मत भाग भरोसे बैठ कभी,कुछ कर के ही कुछ पायेगा,
 हाथों की लकीरें देख,नजूमी ने अक्‍सर समझाया है।

तेरा विप्लव में तो शीर्ष पर था नाम विद्रोही।

तेरा विप्लव में तो शीर्ष पर था नाम विद्रोही।
 जँचा है क्‍या समर्पण को कभी उपनाम विद्रोही॥
घटा क्‍या क्‍या नहीं हो और घटने प्रतीक्षा में ,
 मचा चारों दिशाओं में तुमुल कोहराम विद्रोही।
 तुम्‍हें आदर्श माना था चुने पद चिन्‍ह तेरे ही,
हम चल रहे उस मार्ग पर अविराम विद्रोही।
सहन करता है उसको लोग अब कायर बताते हैं,
हमें संयम बरतने का न दो पैगाम विद्रोही ।
 सतत चलना पथिक की प्रायः कर पहचान होती हैं,
कहीं अस्‍तित्‍व को डस जाय ना विश्राम विद्रोही।
हठीले गर्व के पुतले को तुम कुछ भी न समझाना,
कसौटी बन चिढ़ाएंगे इसे परिणाम विद्रोही।
हरा कर कंस को इतिहास जीता हैं 'दामोदर '
सहोदर चाहिए बस साथ में बलराम विद्रोही।

गांव में जब भी किसी के घर में चूल्‍हा न जल पाता था।

गांव में जब भी किसी के घर में चूल्‍हा न जल पाता था।.
 जो भी होता जिसके घर में वो उसको दे आता था॥
गांव में जब भी किसी के घर में चूल्‍हा न जल पाता था।
 जो भी होता जिसके घर में वो उसको दे आता था॥
पड़ा किसी भी एक में दुःख वो चौपालों पर आकर के,
थोड़ा थोड़ा करते करते सारा ही बंट जाता था।
सम्‍बोधन ऐसे कि जिनमें अपनेपन की सौरभ थी,
 कोई काका, बाबा, दादा, या भाई कहलाता था।
किसी जात के घर की बिटिया की शादी के मौके पर,
सारा गाँव घराती बन कर बढ़ चढ़ हाथ बँटाता था।
भोर की बेला में हर घर की घट्‌टी का घर्राहट ही,
 किसी भी घर के कुशलक्षेम का शुभ संदेश सुनाता था।
टपरी झूंपे की छावन या खेत जोतने की खातिर,
मदद परस्‍पर कर देने को कब कोई कतराता था।
 कल तक धर्म न दीवारें बन बँटवारा कर पाया था,
 ईद मुबारक हिन्‍दू देता मुस्‍लिम होली गाता था।
पनघट पर अल्‍हड़पन को देखा तो समझा ‘दामोदर‘,
क्‍यों मटकी भंजन करने को मन कान्‍हा का ललचाता था।