रविवार, 23 फ़रवरी 2014

आँखों देखी सारी लिखना ,

आँखों  देखी  सारी  लिखना 
कलम हैं एक बुहारी लिखना॥
नेताजी की कटी नाक की,
रहन रखी खुद्‌दारी लिखना।
कौन कौन तो लूट चुके हैं,
अब किसकी है बारी लिखना।
मीठी लिख मशहूर न होना
खार खाय कर खारी लिखना ।
अब के उनकी आँख के आंसू,
सचमुच हैं सरकारी लिखना ।
आघी सच है झूठ सरासर,
खोद खोद कर सारी लिखना।

नव वर्ष की शुभकामनाएँ

दें परस्‍पर इस तरह नव वर्ष की शुभकामनाएँ ।
कल्‍पतरुरों कतारें मन मरुस्‍थल में लगाएं॥
नग्‍न नर्तन हो रहा भय भूख भ्रष्‍टाचार का,
जूझने का इनसे हम,संकल्‍प सामूहिक दोहराएं।
 हैं चतुर्दिक आज हिंसा दहशतों का बोलबाला,
 हैं इन्‍हें जड़ से मिटाना,ये सभी सौगंध खाएं।
नित्‍य नूतन नव सृजनरत सूर्य की पहली किरण,
कहती हैं बीते हुए अध्‍याय सारे भूल जाएं ।
 महजबी,सूबाई नफरत द्वेष को जड़ से मिटाकर।
है तक़ाजा वक्‍त का कि सोच में बदलाव लाएं।
 एक अदना आदमी जो लड़ रहा है सबके लिए,
उसकी हां में हां मिला कर हौसला उसका बढ़ाएं।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

कहीं मिला भूखे बच्चों की खातिर

कहींमिला भूखे बच्चों की खातिर हाथ पसारे बाप ।
 कहीं मिला भूखा बेटों के आगे हाथ पसारे बाप।।
 जल्दी से घर खेत का बंटवारा कर लेते हैं बेटे,
 कहींआंख मूंद कर के आंगन में ज्यों ही पांव पसारे बाप।
 कभी भी कुछ भी मांगे बेटे दे दे मीठे लगते हैं,
 जिस दिन खेंचा हाथ उसी दिन पड़ खारे बाप।
 कुछ बूढ़े जर्जर हाड़ समय की दीमक ने रख छोड़े हैं,
लाठी लेकर ढूंढ़ रहे हैं उनके लिए सहारे बाप।
अपना पहला ग्रास लाड़ से बाप खिलाते बेटे को,
नहीं जवानी में बेटों को लगते इतने प्यारे बाप।
हर बेटे की पैदाइस पर सोचा निकलेगा सरवण,
अब दरवाजे- दर- दरवाजे फिरते मारे मारे बाप।
पितृ शोक में पुत्र मरा हो किसी ग्रंथ में नहीं पढ़ा,
 मिलते दशरथ द्रोण शान्तनु जैसे यहां हमारे बाप।
माँ ने कुछ दिन कोख ढ़ोया जन्म दे दिया पाल दिया,
पर जीवन भर सजा काटते दामोदर दुखियारे बाप।

अन्ना हजारे के नाम

जो सुने ना प्रजा की हुंकार ।
बिलकुल बहरी है सरकार॥
 प्रजातंत्र की पीर अपार,
न गयी ‘अन्‍ना' का दरबार।
 राज मुकुट सिंहासन डोले,
सुन कर ‘अन्‍ना' की ललकार।
 डटे रहेंगे डट कर जो हम,
झुक जायेगी ये सरकार।
कई साल से सोयी थी जो,
जागी जनता फिर इक बार।
उनके तेवर देखे समझा,
क्‍यो पसरा हैं भ्रष्‍टाचार।
प्रजातंत्र की हर धमनी में,
हुआ नये खून का फिर संचार।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

किसी फिर मुझे अपना कहा है।

किसी फिर मुझे अपना कहा है।
अभी भी कौन सा रिश्ता बचा है।।
समन्दर पार से अब के लिखा है,
वहां मुझको कोई जानता हैं।
जाने क्या क्या पढ़ना चाहता है,
मेरा खामोश चेहरा बाँचता है।
उसे पढ़ के लगने लगा है ,
कोई मेरी तरह भी सोचता है।
कमाया नाम क्या उसने 'जांगिड़'
पते के पीछे पीछे भागता है।