शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

एक क़लम बेखौफ हुई

एक क़लम बेखौफ हुई हैं हरदम आग उगलती हैं।
क़लम एक अंदर ही अंदर क्‍यों दिन रात सुलगती है॥
सोच समझ कर कहने वाले कब पूरा सच कहते हैं,
दिल की बात लबों पर आती हैं जब जुबां फिसलती है।
शब्‍द जाल कैसे भी बुनलो, घुमा फिरा कर बात कहो,
समझदार हैं दुनिया सारी जो भोली सी बनती है।
संसद में खुंर्रांट वकीलों की जब से तादाद बढ़ी,
तब से सच इंसाफ की खातिर हफ्‍तों अनशन करती है।
बिकी बिकायी क़लमों पर लिखने की जहमत कौन करे,
अपनी बदनामी के डर से हर इक क़लम झिझकती है।
कब लिखने बैठा था इसको,ग़ज़ल मुकम्‍मल आज हुई,
कहा दौर ने ‘जांगिड़' तेरी बात पुरानी लगती है।

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

कभी भी गिनवा कर के देख ले

 कभी भी गिनवा कर के देख ले सरकार भिखमंगे I
मिलेंगे कोठियों बंगलों में  भी भरमार भिखमंगे II
इनकी हैसियत है क्या भला खुद ही समाझ लेना ,
पढ़े जो दो रूपये का मांग कर अख़बार भिखमंगेI
कला ये मांगने की क्या पता सीखी कहाँ से हैं ,
न खाली हाथ लौटें हैं कभी भी यार भिखमंगेI
इनके   ठाट   देखें   तो   लगे   तगड़े  रईशजादे,
लगे   ये   मंगतें   है   तो   तजुर्बेकार  भिखमंगेI
नहीं   अंधे   अपाहिज बेमुकद्दर  वक्त के  मारे ,
नहीं   झोली ,  कटौरेशर्म ,बेपिंदार  भिखमंगेI
अगरचे   मांगने   निकले  सवेरे शाम को लौटें ,
नहीं तोहीन समझे दर दर खा दुत्कार भिखमंगेI
अभी कुछ और भी कहने ला मन करता तो है लेकिन,
सुना  है  आजकल  के  हैं बड़े खूंखार भिखमंगेI
लगे  अज्जाद इनके अपने पुश्तेनी भिखारी  थे ,
मिले  होंगे यक़ीनन इनको रिश्तेदार भिखमंगेI
इन पर फब्तियां क्यों कर असर कुछ भी नहीं करती ,
बने  हैं कौनसी मिट्टी के आखिरकार भिखमंगे I

रविवार, 19 अक्तूबर 2014

प्यार रहा हर युग में प्यासा

प्यार रहा हर युग में प्यासा I
मिति न जन्मों की जिज्ञासा II
मिलन कथा में विघ्न डालने ,
आ   जाता   कोई     दुर्वासा  I
स्नेह सिन्धु के शुष्क किनारे ,
ज्वार  उठे   भीगे   ठोस  सा I
प्रीत  लगा   मीरा   ने   पाई ,
विरह वेदना अमर पिपासा I
प्रेमी जग को पागल लगते ,
उनको यह जग पगलाया सा I
सूली या विषपान मिलेगा ,
विफल प्रेम  करता मीमांशा I

हम ले सके न थाह आसमान ताकते रहे

हम ले सके न थाह आसमान ताकते रहे।
दिलों के दरमियां पड़ी दरारें नापते रहे॥
किताबे दिल में जो सफा मुड़ा हुआ मिला हमें,
वो पढ़ा हुआ कलाम जान फाड़ते रहे।
रुप ओ मकरंद का व्‍यापार तिसका कर्म था,
डस मधुप को वाटिका का मीत मानते रहे।
नितान्‍त सहज भाव से तूफान तो चला गया,
हिला गया जड़ें उन्‍हीं का दर्द आंकते रहे।
तमाम वाकयात का बयाने मुख्‍तसर हैं ये,
सिले हुऐ से होंठ बार बार कांपते रहे।

वो अपनी पर अड़ा हुआ

वो अपनी पर अड़ा हुआ है।
सिर के बल ही खड़ा हुआ है॥
 कद तो ज्‍यादा नहीं हैं लेकिन
बस बौनों में बड़ा हुआ है।
 लगे सामना हुआ हैं सच से,
चेहरे का रंग उड़ा हुआ है।
 अध जल घघरी सा छलके है,
तिस पर चिकना धड़ा हुआ है।
 सिर पर चढ़ने की ठानी थी,
पर कदमों में पड़ा हुआ है।
 संदेहों का मारा है वो,

किस किस से वो लड़ा हुआ है

क्यों मूक है संवेदनाये

क्यों मूक हैं संवेदनाएं 1
लुंज लून्ठित कल्पनाएँ 11
 स्वार्थ का कंगन धरे हैं ,
प्यार को पसरी भुजाएं 1
 कौख में क्या ढ़ो रही है ,
फिर प्रसूता कामनाएं 1
 ठन गयी इतनी मिलन की ,
 चुक गई संभावनाएं 1
 प्रीत हो विघयप्त कैसे ,
रोकती जग वर्जनाएं 1
 जो प्रणय की साक्षी थी ,
मौन हैं जांगिड दिशाएं 1

खूब करली खुद गरज संसार की बातें

खूब करली खुद गरज संसार की बातें।
आ बैठ करलें चंद लम्‍हें सार की बातें॥
बासी खबर बन रह गयी जिन्‍दा जली दुल्‍हन,
बस है बहस में आज के अखबार की बातें।
अब नफा नुकसान से आगे तो सोचें कुंद हैं,
चल पड़े मैयत पे भी व्‍यापार की बातें।
जले शोहरत पे तेरी हो गए मोहताज सफा के,
मैंने सुनी हैं उनमे से दो चार की बातें ।
फर्ज उनके भी जो हैं उनको बताइए,
करते हैं सुबहो शाम जो अधिकार की बातें।

राम ,भीष्म ,प्रह्लाद ,ध्रुव की

राम, भीष्‍म, प्रहलाद, ध्रुव की कब बन पाती गाथाएं।
हैं सूत्रधार हर एक कथानक में सौतेली माताएं॥
किसी पराये जाये को भी अपना जान के पाला हो,
 उदाहरण के लिये मिलेगी बस दो चार यशोदाएं।
सौतेली संतान अगर मां गंगा के भी होंती तो,
सौत पुत्र तक पहुँच ना पायेगी उसकी भी धाराएं।
बिन मां की संतान क्‍या जानेगी ममता के अर्थों को,
 न मां की गोद में पढ़ समझेगा ममता की परिभाषाएं।
सुना था जिसका नाम हैं मां वो बहुत बड़े दिलवाली हैं।
 पर देखी कोख के इर्द गिर्द सिमटी हृदय की सीमाएं।
पति की पहली बीवी की संतान को केवल ‘दामोदर‘
विवशता वश प्‍यार जताती देखी बांझ वितण्‍डाएं।

रहा न कोई शिकवा बाकी

रहा न कोई शिकवा बाकी अब मतलब के यारों से।
एक एक कर काम पड़ा जब अपने रिश्‍तेदारों से॥
किसी का चूल्‍हा ठण्‍डा करके जिन्‍हे चुरा ले आयें हैं,
जल जाओेगे हाथ सेंकने वालों इन अंगारों से।
कई डोलियां और अर्थियां इस आंगन से विदा हुई,
कब कब सच्‍चे आँसू आये पूछो इन दीवारों से।
दौलत,रुतबा, हुस्न,जवानी साथ उम्र भर कब देते,
आज सिसकियों में बदली जो आती सदा मजारों से।
 कहते क्‍या हैं करते कुछ है क्‍या इनके मंसूबे हैं,
हमसे ज्‍यादा कौन हैं वाकिफ इन सब साहूकारों से।
 हमको सच्‍चा समझ के पढ़ने वाले क्‍या क्‍या सोचेंगे,
पूछ रही हैं आज किताबें छुप छुप कर किरदारों से ।
 लबादा ओढ़ के खैरख्‍वाह का स्‍वार्थ सामने आयेंगे,
हरगिज बच के रहना 'जांगिड'इन सब रंगे सियारों से 

कभी नहीं चुप राहने वाले किरदारों खामौशी

कभी  नहीं चुप रहने वाले किरदारों  की  खामोशी।
किसका कर्ज चुकाती होगी, अखबारों की खामोशी।
किसे जला  कर दहक रहे ये,या स्‍वाहा कर डालेंगे,
पता  चलेगा  जब  टूटेगी , अंगारों  की  खामोशी।
नहीं  बिकाऊ  बचा  हैं कोई क्‍या क्रेता कंगाल हुए,
ठाली  ठाली  सी  बैठी  जो, बाजारों  की  खामोशी।
जीने  से  उकतायी हैं ,या  जीवन को ढूंढ़ को रही,
कितने भेद लिये फिरती हैं, बंजारों की खामोशी।
तेल डाल जिनके कानों में, बुरी तरह धमकाया है,
सिले होंठ दिखलाती बेबस, दीवारों की खामोशी।
मौल भाव तय करके सौदा, किसे जुबां दे आयी हैं,
टुकर  टुकर  कर देख रही ,पहरेदारों की खामोशी।
पथराई पलकों  में गूंगी पीड़ा  साफ  झलकती हैं,
भेद को भेद न रख पायी हैं हरकारों की खामोशी।
इसकी उसकी या फिर उनकी या 'दामोदर' तेरी भी,
अलग थलग हैं खुद ब खुद में हम चारों की खामोशी।

खरे मोती बनी जब जब बही बूंदें पसीने की

खरे मोती बनी जब जब बही बूंदी पसीने की।
ह़कों से रह गयी वंचित वहीबूंदी पसीने की॥
उचित हक़ दो इन्‍हें इनका नहीं सैलाब बन कर के,
डुबो देगी तेरी दूनिया यही बूंदें पसीने की।
इसे पूँजी व साम्‍यवाद ने मिल कर के लूटा है,
दिलासे ले के बस बहती रही बूंदे पसीने की।
हिमायत करने वाले सरनगूं होंगे नदामत से,
दिखादे खोल कर अपनी बही बूदें पसाने की।
ये संगो खिस्‍त से मिलके बने खालिक फसीलों की,
कभी फूलों की नकअत में छुपी बूंदें पसीने की।

शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

छोड़ कर जाना नहीं तू गाँव की दहलीज को

छोड़ कर जाना नहीं तू गाँव की दहलीज को
शहर में तहजीब के पहरे कड़़े हो जायेंगे॥
 इन खरोंचों को हिफाजत से रखोगे तो यही,
जख्‍म आखिर एक दिन काफी बड़े हो जायेंगे।
कब्र गहरी खोद कर के इस तरह पत्‍थर चुने,
जैसे हो शुब्‍हा कि ये उठ कर खड़े हो जायेंगे।
 मर गये बेमौत इतने आज तो आँसू बहा
कल सुबह अखबार के ये आँकड़े हो जायेंगे।
चाँद ने मायूस हो कर चाँदनी से यूं कहा,
अपना क्‍या होगा अगर तारे बड़े हो जायेंगे।
इस कदर जज्‍बात को छेड़ा करो न रात दिन,
हैं बड़े मासूम ये फिर चिड़च़िड़े हो जायेंगे।

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।
और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥
 जब ये विरही के मन की तहों में गयी,
तब गयी दौड़ पी के नगर लेखनी।
जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुना,
तो सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।
 हासिये तू भी सुर्खी तक आ सका
जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।
 जो इतिहास लिख्‍खी थी तलवार ने
मिट गयी होती होती न गर लेखनी।
 जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश है,
इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।
 जो भी ढ़र्रे से हट के चली है कभी

 हुई वो अमर  दामोदर  लेखनी।

वो मुझको समझाने बैठा

वो मुझको समझाने बैठा ।
अब की तीर निशाने बैठा।
कल तक अश्क पराये पौछे,
आखिर अश्क बहाने बैठा।
फिर कालिख तैयार करेगा।
जो कि दीप जलाने बैठा।
जो कल तो खुद ही मिट जाते,
वो ही वर्ण मिटाने बैठा ।
एक अबूझ मुअम्‍मा हैं जो,
वो उसको सुलझाने बैठा।
सूदखोर बस मूल चुका कर,
गिरवी सांस छुड़ाने बैठा।
अहसानों से हासिल की उस,
शोहरत पर इतराने बैठा।
सपनों के बुनकर से कह दो,
भोर तेरे सिरहाने बैठा ।

सब का मन ललचाये कुर्सी

सब का मन ललचाये कुर्सी।
क्‍या क्‍या नाच नचाये कुर्सी ॥
यूं ही सहज नहीं मिल जाती ,
सैण्‍डल तक उठवाये कुर्सी ,
नींद उसे फिर कब आती है,
अगर जरा हिल जाये कुर्सी ।
कौन छोड़ ना फिर चाहेगा ,
एक बार मिल जाये कुर्सी ।
जीते जी ही वो मर जाता ,
जिसकी भी छिन जाये कुर्सी ।
करे फाइलें कानाफूसी,
क्‍या क्‍या चट कर जाये कुर्सी।
लगी हैं चलने यहां कुर्सियां ,
क्‍या क्‍या दौर दिखाये कुर्सी ।

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

मन मरुस्थल में अज़ब सूखा पड़ा है।

मन मरुस्थल में अज़ब सूखा पड़ा है।
नेह का बदल अज़ब रूखा खड़ा है ।।
कोंध कर बिज़ली ने अम्बर से निहारा ,
कौन सा दरख्त यहाँ तन कर खड़ा है।
गर्म लगाती है जमाने की हवा भी ,
हर जगह तहज़ीब का पहरा कड़ा है ।
वो मसलने के लिए उद्यत खड़े थे,
साख से कोई टूट कर गुंचा झड़ा है।
चंद खुशियों की सजी महफ़िल थी लेकिन ,
मुश्किलों का अलहदा अपना धड़ा है ।
ठूंठ सुखा भरभरा कर रो ओअदा था ,
 इन्तेहाँ तक आदमी से जो लड़ा है।
रुक गए छांह ठंडी देख कर जब ,
 तब यह जाना पांव में कांता चुभा ह।
सुस्ता रहे थे कि सड़क धीरे से बोली,
मील का पत्थर अभी आगे गडा है।

निष्फलता का त्राण यही है

निष्‍फलता का त्राण यही है।
क्‍या जीवन संग्राम यही है॥
 धूप बत्‍तियां बुझ कर बोली ,
शापित जीवनदान यही है ।
 दुष्‍टों के भय से मंदिर में,
दुबका जो भगवान यही है।
 भोग चढ़ा कर जो मांगा था,
वो दुर्लभ वरदान यही है।
 हाथ झटक देता छूने पर,
क्‍या सबरी का राम यही है।
 आज पराई सी लगती है,
पर मेरी पहचान यही है।
 कण दे कर मन की अभिलाषा,
भक्‍ति का प्रमाण यही है।

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

किसी भी घर के दरवाजे।

खुले रहें या बंद पड़े हों किसी भी घर के दरवाजे।
 सादा गुजरागाहों को तकते हैं हसरत से दरवाजे।।
सिंह द्वार पर बिठा रखें हैं जिसने चौकीदार कई ,
 नहीं जनता खुले पड़ें हैं उसके पिछले दरवाजे।
दरवाजे पर दस्तक दीन फिर दुःख ही आया होगा ,
 इसी वहम से खुले नहीं हैं किसी भी घर के दरवाजे।
 केवल बौने लोग ही देखे इस घर से आते जाते ,
किसकी खातिर बना रखे फिर इतने ऊँचे दरवाजे।
 दरवाज्व पर बैठे रहते मदद मिले ही उठाते थे ,
आज उन्होंने बंद क्र लिए झट से अपने दरवाजे।
चाहे कितनी एहतियात से खोलो अथवा बंद करो ,
 चुगलखौर हैं बज कर सब कुछ जाहिर करते दरवाजे।
 बंद किन्वारों पर मकड़ी ने भी तहरीर लिखी 'जांगिड़ '
ऐसे होते लावारिश और यायावर के दरवाजे।

उसका आ जाना खला

उसका आ जाना खला या उसका न आना खला है,
अजब से तजबजुब में जिन्‍दगी का मसअला।
मत गौर कर नजदीक से ना जिन्‍दगी को देखना,
पैदाईश से हैं शुरु ये मौत तक का फासिला।
उसके लिए वो वाकिया था रोजमर्रा की तरह,
कि बरपा था मेरे लिए बन के कहर दो फैसला।
उफ! मेरी मिन्‍नतकशी और बेनियाजी आपकी,
कौन से मकसूद पे ठहरेगा जा ये सिलसिला।
नक्‍शे कफे पां की मेरी इक अलहदा पहचान हैं,
पांव हैं नंगे मेरे और पांव में हैं आबला।
रात झिगुरों मे बाहम गुफ्तगू होती रही,
अब अंकबूतों का बसेरा बन गया सहने खला।

अनपढ़ हैं पर सच्चे दिल हैं

अनपढ़ हैं पर सच्‍चे दिल हैं बिलकुल भोले भाले लोग।
हैं मिट्टी की सौंधी खुशबू से गांव में रहने वाले लोग॥
छोटी बहर की ग़ज़ल के मतले ज्‍यूं सीने से लग जाते ,
कुछ मिलते हैं औराकों में फैले हुए मकाले लोग ।
नहीं गांठ से दुखदायी हैं न फोड़े ज्‍यूं जलते हैं,
सहलाते ही फट पड़ते हैं जैसे पांव के छाले लोग।
सदा छिपा लेने की जिद में सब जाहिर कर देते हैं ,
फटे लबादों पर रखते हैं बिलकुल नये दुशाले लोग।
नगर गाँव बस्‍ती घूमा हूँ बंजारे सा 'दामोदर' ,
मिले हैं इस बस्‍ती में जाने कैसे अजब निराले लोग।

सखी सच है की सच होते हैं क्या

सखी सच हैं कि क्‍या होते हैं सच सब भौर के सपने।
कि देखे मन मयूरी नृत्‍य करते मौर के सपने॥
जहां पर स्‍वर्ण मृग को हांफ कर रुकते हुए देखा,
अनाड़ी मन ने देखें हैं भला उस छौर के सपने।
मिले विरही के मन जैसा मरुस्‍थल जो युगों प्‍यासा,
वहां जम कर के बरसूं हैं घटा घनघोर के सपने।
चुरा कर के किसी का कुछ,बने स्‍वामी वो बौराए,
धरोहर ज्‍यूं उसे रखने के हैं इक चोर के सपने।
फड़क दिल धक्‌ से रह जाएं निहारुँ एकटक उसको,
बड़े अदभुत अनाड़ी धड़कनों के शोर के सपने।
मेरे सपनों आ करके कोई करता चुहल ‘जांगिड‘
लगे हैं आजकल अपने से मुझको और के सपने।

खो रहे पहचान हम

खो रहे पहचान हम गुमनामी कसती फब्‍तियां ।
अब हमारी रह गयी पहचान केवल तख्‍तियां ॥
 हट सड़क से इक गली में फिर गली उसमें गली,
 रहते हो गोया कि छुप के जी रहे हो बस मियां ।
 खुद को भी पहचानने से कल मुकर जायेंगे वो,
जिनकी बस पहचान होती कुर्सी, तमगे, कुर्सियां।
जानता न डाकिया कि कौन है रहता कहां ,
दो जनों की दे गवाही रखी हैं अर्जियां ।
खो चुके पहचान को पहचान पाने के लिए ,
हाथ धोया हासियों से मिल न पायी सुर्खियां।

तेरा विप्लव में तो नाम था

तेरा विप्लव में तो शीर्ष पर था नाम विद्रोही।
जँचा है क्‍या समर्पण को कभी उपनाम विद्रोही॥
घटा क्‍या क्‍या नहीं हो और घटने प्रतीक्षा में ,
 मचा चारों दिशाओं में तुमुल कोहराम विद्रोही।
तुम्‍हें आदर्श माना था चुने पद चिन्‍ह तेरे ही,
हम चल रहे उस मार्ग पर अविराम विद्रोही।
 सहन करता है उसको लोग अब कायर बताते हैं,
 हमें संयम बरतने का न दो पैगाम विद्रोही ।
 सतत चलना पथिक की प्रायः कर पहचान होती हैं,
कहीं अस्‍तित्‍व को डस जाय ना विश्राम विद्रोही।
हठीले गर्व के पुतले को तुम कुछ भी न समझाना,
 कसौटी बन चिढ़ाएंगे इसे परिणाम विद्रोही।
हरा कर कंस को इतिहास जीता हैं 'दामोदर '
सहोदर चाहिए बस साथ में बलराम विद्रोही।

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

कविता में पूरी की पूरी

कविता में पूरी की पूरी ।
 रह जाती हैं बात अधूरी॥
 नहीं पटी हैं किसने पाटी,
भावों से शब्दों की दूरी ।
 सारी कागज पर लिख डालो,
पीड़ा कब देती मंजूरी ।
 अर्थों की बैसाखी ढूंढें,
 कथ्‍यों की कैसी मजबूरी।
 हर कोई पढ़ कर 'दामोदर'
समझ भी जाये नहीं जरुरी।

ग़ज़ल कहे पूरी की पूरी

ग़ज़ल कहे पूरी की पूरी 1
रही सुखनवर बात अधूरी 11
नहीं पटी है किसने पाटी ,
भावों से शब्दों की दूरी 1
अर्थों की बैसाखी ढूंढे ,
कथ्यों की कैसी मज़बूरी 1
सारी कागज़ पर लिख डालो ,
पीड़ा कब देती मंज़ूरी 1
पढ़ कर के पाठक "दामोदर " ,
समझ भी जाये नहीं जरूरी 1

छोटा सा कटोरा था उसका

छोटा सा कटोरा था उसका, दो मुठ्ठी ले भर आया है।
 पर देख के मेरी झोली को, सर दाता का चकराया है॥
 उन चाँद सितारों को पा कर ,इतराये वो भरमाये वो ,
 रस्‍ते का रोड़ा मान जिन्‍हें,बहुधा हमने ठुकराया है।
 दिल अंकबूत हैं सपनों, ताना बाना बनता रहता,
किस पर दोष मढ़ें जिसने,इसमें हमको फंसवाया है।
 चीखी थी हदें तानाजन कि, हद होती हैं लाचारी की,
 कूव्‍वत होती हैं जिसमें वो,इक हद तक ही रुक पाया है।
 जब जब भी खुदा से रुठा मैं,हर बार मनाने आया वो,
 रुठा हैं खुदा उसका उससे,कर अरदासें उकताया है।
 मत भाग भरोसे बैठ कभी,कुछ कर के ही कुछ पायेगा,
हाथों की लकीरें देख,नजूमी ने अक्‍सर समझाया है।

बुधवार, 13 अगस्त 2014

क्‍या देखा क्‍या भोगा

क्‍या देखा क्‍या भोगा तुमने आकर दुनियादारी में।
 हाथ बंटाने वाले कम हैं दुखः की सांझेदारी में।
 हानि लाभ तलाशा जाता मदद के लेने देने में,
 रिश्‍ते रोग विहीन रहे ना स्‍वार्थ की बीमारी में।
 उसने उँचा मोल वसूला उसने वजन में कम तौला।
सब ने घाटा भरती करली अपनी अपनी बारी में।
 अतुल त्‍याग मां का बेटों ने कर्जा मान उतारा तो,
फटा पुराना मां का आँचल फफक पड़ा लाचारी में,
 रिश्‍तों का असतित्‍व बोध अब लेन देन से होता हैं,
लेनदेन क्‍या श्‍ोष भला रहता हैं टूटी यारी में।
 जीवन रुपी नाम नकल मत पन्‍ने बरबाद करो,
नहीं वसूली हो पायेगी बेचा अगर उधारी में।
 कृष्‍ण सुदामा का याराना इसी लिऐ मशहूर हुआ,
गर्जमंदको दे देने का सद्‌गुण था गिरधारी में

किसी ने फिर मुझे अपना कहा है

किसी ने फिर मुझे अपना कहा है I
 अभी भी कौन सा रिश्ता बचा है II
 समन्दर पर से अबके लिखा है '
 वहां भी कोई मुझाको जनता है I
न जाने क्या क्या पढ़ना चाहता है '
 मेरे खामोश चेहरा बांचता है I
 उसे पढ़ कर के यूं लगाने लगा है '
कोई मेरी तरह भी सोचता है I
कमाया नाम क्या उसने वो अब तक '
पते के पीछे पीछे भागता है I

मन मरूस्थल में गज़ब सूखा पड़ा है

मन मरूस्थल में गज़ब सूखा पड़ा है I
नेह का बादल अज़ब रूखा खड़ा है II
कोंध कर अम्बर से बिजली ने निहारा,
कौनसा दरख़्त यहाँ सबसे बड़ा है I
गर्म लगाती है ज़माने की हवा भी ,
हर जगह तहजीब का पहरा कड़ा है I
वो मसलने के लिए उद्द्यत खड़े थे ,
शाख से जब भी कोई गुंचा झाडा है I
रुक गए थे छांह ठंडी देख कर जब ,
तब यह जाना पांव में कांता गडा है I
चंद खुशियों की सजी महफ़िल थी लेकिन ,
मुश्किलों का अलहदा अपना धडा है I

बंट रहा बचपन से

बंट रहा बचपन से फिरता उखड़ा उखड़ा आदमी।
इस कदर टूटा हुआ हैं टुकड़ा टुकड़ा आदमी॥
 रिश्ता अभिवादन से थोड़ा सा जरा आगे बढ़ा,
 रूह से रूखा मिला वो चिकना चुपड़ा आदमी।
 पूर्वजों ने रीढ़ के बल उठने की कोशिश की,
 हो रहा हैं दिन ब दिन क्‍यों फिर से कुबड़ा आदमी।
 परिवार की परिभाषा बीवी बच्‍चों तक महदूद हैं,
कर रहा हैं हद से ज्‍यादा, दिल को संकड़ा आदमी।
 मतलबी हैं या हैं कुछ मजबूरियां उसकी कोई,
 झुकता हैं बौनों के आगे लम्‍बा तगड़ा आदमी।
 पाप ,पुण्‍य, स्‍वर्ग का मोह नर्क का डर है उसे,

 और धर्म की ब्रह्मपाश बैठा है जकड़ा आदमी।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

क्या क्या नाच नचाये कुर्सी

नाच    कई   नचावाए  कुर्सी /
कितनों को ललचाये कुर्सी //
नींद उसे फिर कब आती है /
गर थोड़ी सी हिल जाए कुर्सी //
फिर मिलना आसान नहीं है /
जो एक बार छिन जाए कुर्सी//
यूँ ही  सहज नहीं मिल जाती /
 सैण्डिल तक उठवाए कुर्सी//
कौन छौड़ना फिर चहेगा /
जिसको भी मिलजाए कुर्सी //

सोमवार, 17 मार्च 2014

देखता हूँ इन दिनों फिर लोग चिल्लाने लगे

देखता हूँ इन दिनों फिर लोग चिल्लाने लगे I
ये स्वर ललकार के कुछ जाने पहचाने लगे II
धन ने भी गिरगिट से सिखा है कोई हूनर जरुर,
धीरे   धीरे  रंग   इस के  सामने  आने   लगे I
फ़िक्र उनको मुल्क की होने लगी है आज फिर,
कुर्सी छिन जाने के डर से सायद घबराने लगे I
देश का पैसा अमानत मन रखवाले रहे ,
अख़बारों के आंकडे पढ़ अब वो पछताने लगे I
और कुछ खाने की कोई क्यों खबर आई नहीं ,
वि जुगाली ले रहें हैं या कि सुस्ताने लगे I
उनके झांसे में न आना वो बड़े मक्कार हैं,
बरी बरी आ के सारे  मुझको समझाने लगे I
जैसे भी मुमकिन हो सझोता करें हालात से ,
जो न ऐसा कर सके वो लोग दीवाने लगे I

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।
 और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥
 जब ये विरही के मन की तहों में गयी,
 तब गयी दौड़ पी के नगर लेखनी।
जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुना,
 तब सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।
हासिये तू भी सुर्खी तक आ सका ,
जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।
जो इतिहास लिख्‍खी थी तलवार ने,
 मिट गयी होती होती न गर लेखनी।
जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश है,
इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।
जो भी ढ़र्रे से हट के चली है कभी,
  हुई वो अमर दामोदर लेखनी।

रविवार, 2 मार्च 2014

निस्संदेह वो संभालेगा

निस्संदेह  वो  संभालेगा  इतना खोकर अबकी  बार  I
अच्छी खासी खा बैठा है फिर वो ठोकर अबकी बार II
पथराई    पलकों  में  पीड़ा   पढ़ने  वाले  पाठक   भी,
अपने दुखड़े व्यक्त करेंगे आखिर रोकर अबकी बार  I
मन का मैल यथावत रखने में वो कुशल हुआ इतना ,
कहता मन पर अंकित सब कुछ धोकर आया अबकी बार  I
कथा कआनत की कहते थे कभी मुज़स्स्म काबुल के ,
कर दी चकनाचूर पलों में वाही धरोहर अबकी बार  I
तेरा   तेरा   मेरा   मेरा   झगडा   सिर्फ   हमारा   है ,
बस  इतनी सी बात न समझे दाना होकर अबकी बार  I
मानवता की मूक मंत्रणा करते थे जो मुजस्समें ,
बामियान में पास पास ली वहो धरोहर अबकी बार  I
ये नपी तुली भाषा शब्दों को थोक पिंदकर देखा है ,
संबोधन बदले सहमे  से हैं 'दामोदर 'अबकी बार  I

छोटा सा कटोरा था उसका, दो मुठ्ठी ले भर आया हैं।

छोटा सा कटोरा था उसका, दो मुठ्ठी ले भर आया हैं।
 पर देख के मेरी झोली को, सर दाता का चकराया है॥
उन चाँद सितारों को पा कर ,इतराये वो भरमाये वो ,
रस्‍ते का रोड़ा मान जिन्‍हें,बहुधा हमने ठुकराया है।
दिल अंकबूत हैं सपनों, ताना बाना बनता रहता,
किसको दोष मढ़ें जिसने, इसमें हमको फंसवाया है।
चीखी थी हदें तानाजन कि, हद होती हैं लाचारी की,
कूवत होती हैं जिसमें वो,इक हद तक ही रुक पाया है।
जब भी खुदा से रुठा मैं, हर बार मनाने आया वो,
रुठा है खुदा उसका उससे,कर अरदासें उकताया है।
 मत भाग भरोसे बैठ कभी,कुछ कर के ही कुछ पायेगा,
 हाथों की लकीरें देख,नजूमी ने अक्‍सर समझाया है।

तेरा विप्लव में तो शीर्ष पर था नाम विद्रोही।

तेरा विप्लव में तो शीर्ष पर था नाम विद्रोही।
 जँचा है क्‍या समर्पण को कभी उपनाम विद्रोही॥
घटा क्‍या क्‍या नहीं हो और घटने प्रतीक्षा में ,
 मचा चारों दिशाओं में तुमुल कोहराम विद्रोही।
 तुम्‍हें आदर्श माना था चुने पद चिन्‍ह तेरे ही,
हम चल रहे उस मार्ग पर अविराम विद्रोही।
सहन करता है उसको लोग अब कायर बताते हैं,
हमें संयम बरतने का न दो पैगाम विद्रोही ।
 सतत चलना पथिक की प्रायः कर पहचान होती हैं,
कहीं अस्‍तित्‍व को डस जाय ना विश्राम विद्रोही।
हठीले गर्व के पुतले को तुम कुछ भी न समझाना,
कसौटी बन चिढ़ाएंगे इसे परिणाम विद्रोही।
हरा कर कंस को इतिहास जीता हैं 'दामोदर '
सहोदर चाहिए बस साथ में बलराम विद्रोही।

गांव में जब भी किसी के घर में चूल्‍हा न जल पाता था।

गांव में जब भी किसी के घर में चूल्‍हा न जल पाता था।.
 जो भी होता जिसके घर में वो उसको दे आता था॥
गांव में जब भी किसी के घर में चूल्‍हा न जल पाता था।
 जो भी होता जिसके घर में वो उसको दे आता था॥
पड़ा किसी भी एक में दुःख वो चौपालों पर आकर के,
थोड़ा थोड़ा करते करते सारा ही बंट जाता था।
सम्‍बोधन ऐसे कि जिनमें अपनेपन की सौरभ थी,
 कोई काका, बाबा, दादा, या भाई कहलाता था।
किसी जात के घर की बिटिया की शादी के मौके पर,
सारा गाँव घराती बन कर बढ़ चढ़ हाथ बँटाता था।
भोर की बेला में हर घर की घट्‌टी का घर्राहट ही,
 किसी भी घर के कुशलक्षेम का शुभ संदेश सुनाता था।
टपरी झूंपे की छावन या खेत जोतने की खातिर,
मदद परस्‍पर कर देने को कब कोई कतराता था।
 कल तक धर्म न दीवारें बन बँटवारा कर पाया था,
 ईद मुबारक हिन्‍दू देता मुस्‍लिम होली गाता था।
पनघट पर अल्‍हड़पन को देखा तो समझा ‘दामोदर‘,
क्‍यों मटकी भंजन करने को मन कान्‍हा का ललचाता था।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

आँखों देखी सारी लिखना ,

आँखों  देखी  सारी  लिखना 
कलम हैं एक बुहारी लिखना॥
नेताजी की कटी नाक की,
रहन रखी खुद्‌दारी लिखना।
कौन कौन तो लूट चुके हैं,
अब किसकी है बारी लिखना।
मीठी लिख मशहूर न होना
खार खाय कर खारी लिखना ।
अब के उनकी आँख के आंसू,
सचमुच हैं सरकारी लिखना ।
आघी सच है झूठ सरासर,
खोद खोद कर सारी लिखना।

नव वर्ष की शुभकामनाएँ

दें परस्‍पर इस तरह नव वर्ष की शुभकामनाएँ ।
कल्‍पतरुरों कतारें मन मरुस्‍थल में लगाएं॥
नग्‍न नर्तन हो रहा भय भूख भ्रष्‍टाचार का,
जूझने का इनसे हम,संकल्‍प सामूहिक दोहराएं।
 हैं चतुर्दिक आज हिंसा दहशतों का बोलबाला,
 हैं इन्‍हें जड़ से मिटाना,ये सभी सौगंध खाएं।
नित्‍य नूतन नव सृजनरत सूर्य की पहली किरण,
कहती हैं बीते हुए अध्‍याय सारे भूल जाएं ।
 महजबी,सूबाई नफरत द्वेष को जड़ से मिटाकर।
है तक़ाजा वक्‍त का कि सोच में बदलाव लाएं।
 एक अदना आदमी जो लड़ रहा है सबके लिए,
उसकी हां में हां मिला कर हौसला उसका बढ़ाएं।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

कहीं मिला भूखे बच्चों की खातिर

कहींमिला भूखे बच्चों की खातिर हाथ पसारे बाप ।
 कहीं मिला भूखा बेटों के आगे हाथ पसारे बाप।।
 जल्दी से घर खेत का बंटवारा कर लेते हैं बेटे,
 कहींआंख मूंद कर के आंगन में ज्यों ही पांव पसारे बाप।
 कभी भी कुछ भी मांगे बेटे दे दे मीठे लगते हैं,
 जिस दिन खेंचा हाथ उसी दिन पड़ खारे बाप।
 कुछ बूढ़े जर्जर हाड़ समय की दीमक ने रख छोड़े हैं,
लाठी लेकर ढूंढ़ रहे हैं उनके लिए सहारे बाप।
अपना पहला ग्रास लाड़ से बाप खिलाते बेटे को,
नहीं जवानी में बेटों को लगते इतने प्यारे बाप।
हर बेटे की पैदाइस पर सोचा निकलेगा सरवण,
अब दरवाजे- दर- दरवाजे फिरते मारे मारे बाप।
पितृ शोक में पुत्र मरा हो किसी ग्रंथ में नहीं पढ़ा,
 मिलते दशरथ द्रोण शान्तनु जैसे यहां हमारे बाप।
माँ ने कुछ दिन कोख ढ़ोया जन्म दे दिया पाल दिया,
पर जीवन भर सजा काटते दामोदर दुखियारे बाप।

अन्ना हजारे के नाम

जो सुने ना प्रजा की हुंकार ।
बिलकुल बहरी है सरकार॥
 प्रजातंत्र की पीर अपार,
न गयी ‘अन्‍ना' का दरबार।
 राज मुकुट सिंहासन डोले,
सुन कर ‘अन्‍ना' की ललकार।
 डटे रहेंगे डट कर जो हम,
झुक जायेगी ये सरकार।
कई साल से सोयी थी जो,
जागी जनता फिर इक बार।
उनके तेवर देखे समझा,
क्‍यो पसरा हैं भ्रष्‍टाचार।
प्रजातंत्र की हर धमनी में,
हुआ नये खून का फिर संचार।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

किसी फिर मुझे अपना कहा है।

किसी फिर मुझे अपना कहा है।
अभी भी कौन सा रिश्ता बचा है।।
समन्दर पार से अब के लिखा है,
वहां मुझको कोई जानता हैं।
जाने क्या क्या पढ़ना चाहता है,
मेरा खामोश चेहरा बाँचता है।
उसे पढ़ के लगने लगा है ,
कोई मेरी तरह भी सोचता है।
कमाया नाम क्या उसने 'जांगिड़'
पते के पीछे पीछे भागता है।