रविवार, 31 जुलाई 2011

आदमी या आदमी का आदमी रुप खोटा आदमी ।
कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥
आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढ़ने ,
और कर के कत्‍ल लौटा, आदमी का आदमी।
आदमी की रुह आखिर तिलमिला कर रह गयी,
 रख रहा गिरवी लंगोटा, आदमी का आदमी।
इतनी भारी भीड़ में भी हैं अकेला आदमी।
कर रहा महसूस टोटा, आदमी का आदमी।
आदमी का कद अगर दें आदमी को नापने,
 नाप दे छोटे से छोटा, आदमी का आदमी ।

गिनता है हर साँस

गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार।
बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥
कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव,
दुखियारे दुःख पास बैठ के करते अब उपचार।
सांसे जितनी ले कर आये कम पड़ती देखी,
अधिक सूद का लालच दे कर ले ली और उधार।
ये रस्‍ता तो बस्‍ती से सीधा मरघट को जाता है,
न जाने किस रस्‍ते पर हैं स्‍वर्ग नर्क के द्वार।
चंदे के मंदिर में बैठा निर्भर नित्‍य पुजारी पर,
भक्‍त खड़े हैं कितने उसके आगे हाथ पसार।
जिसकी भी चाहे जैसी वो किस्‍मत लिख देता है,
किसने दिये विधाता को ये ‘दामोदर‘ अधिकार।

यूं तो आंसू


यूं तो आंसू आँखों में आयी दो बूंदें पानी हैं।
वैसे ये गूंगी पीड़ा की भाषा जानी मानी हैं॥
रोके से ना रोके जाएं आंसू आ ही जाते हैं,
सौ दीवारें भी लांघी जो आ जाने की ठानी हैं।
खामोशी ही खमोशी फैली हैं चाहे राहों में, 
रुठी यादें कैदी आहें क्‍यों खाना वीरानी हैं।
ये सांसों की आवाजाही ही तो थोड़ी बाकी हैं
यूं जी लेना या ना जीना दोनों ही बेमानी हैं।
यारों ने याराना ओढ़ी थोपी हैं लाचारी ही,
मौका आया तो वो सारी सौगातें लौटानी हैं।
दाता को देना होता तो दे के ही भेजा होता ,
खाली लौटाया रोजाना क्‍या झोलियाँ फैलानी हैं।

रूतबा भी सरकारी


रुतबा भी सरकारी अजीमों शान सरकारी ।
मेरा कुछ भी नहीं छोड़कर पहचान सरकारी॥
बहुत बौना हूँ मैं अब भी यदि तुलना करुं तुमसे,
बढ़ा पाया नहीं है कद मेरा सम्‍मान सरकारी।
मेरी हर जीत होती हैं हमेशा हार से बदतर,
पैदी मात खाऊं जो न हो मैदान सरकारी।
किसी का भी कोई अभिशाप मुझको छू नहीं पाये,
कि कुर्सी हैं हिफाजत के लिए वरदान सरकारी।
नहीं हूँ वो जो दिखता कोई विस्‍मय नहीं करना,
मिले तब हाथ फैलाये मेरा अभिमान सरकारी।

छल कपट पी

छल कपट घुट्टी में पी पला आदमी I
आज बैठा है खुद को छला आदमी II
जात दर जात पहले हुआ मुन्कशिम ,
और चला खोजने जात का आदमी I
तिफ्‍ले आदम कहाने का ह़क खो दिया,

आदमीयत से इतना गिरा आदमी।
आदमी के भरोसे पुकारा था पर ,
वो तो निकला बहुत ही बड़ा आदमी I
छाछ को देखते ही तो थर्रा गया ,
वो धुला दूध का सांवला आदमी I
जब सुराबों के पीछे भगा बावला ,
बन गया मौत का फलसफा आदमी I
जब छुआ टूटता और बिखरता गया ,
हो गया एक दम भुरभुरा आदमी I
जून्झ कर जिंदगी से पराजित हुआ ,

बद दुआओं का एक शिलशिला आदमी I




 जब सुराबों के पीछे भगा बावला,
बन गया मौत का फलसफा आदमी।
जब छुआ टूटता और बिखरता गया,
हो गया एकदम भुरभुरा आदमी।
 जूंझ कर जिंदगी से पराजित हुआ,

बद्‌दुआओं इक एक सिलसिला आदमी।

रोज चीखते अखबार

रोज चीखते अखबार तो, सरकार क्‍या करे।
पसरे हैं भ्रष्‍टाचार तो, सरकार क्‍या करे॥
डिप्‍लोमा, डिग्रियां लिये, तादाद में इतने,
बैठे हैं जो बेकार तो, सरकार क्‍या करे।
सियासत के हर शोबे में मुजरिमान की ऐसे,
हैं हो गयी भरमार तो, सरकार क्‍या करे।
जम्‍हूरियत के नाम से अब मुल्‍क में मेरे,
वो करते कारोबार तो ,सरकार क्‍या करे।
गर खास मोहरों को बचाने में मुल्‍क का ,
होता है बंटाढ़ार तो, सरकार क्‍या करे।
भोपाल गैस काण्‍ड से होते हैं फैसले ,
गर आदिल हैं लाचार तो, सरकार क्‍या करे।

शनिवार, 30 जुलाई 2011

वो अपनी पर अड़ा हुआ है।

वो  अपनी  पर  अड़ा  हुआ  है।
सिर  के बल ही खड़ा हुआ  है॥
कद तो ज्‍यादा नहीं हैं लेकिन,
बस  बौनों  में  बड़ा  हुआ  है।
 लगे  सामना  हुआ हैं सच से,
चेहरे  का  रंग  उड़ा  हुआ  है।
अध जल घघरी सा छलके है,
 तिस पर चिकना धड़ा हुआ है।
सिर  पर  चढ़ने  की  ठानी थी,
पर  कदमों  में  पड़ा  हुआ  है।
संदेहों     का   मारा   है    वो,
किस किस से वो लड़ा हुआ है।

क्‍या देखा क्‍या भोगा तुमने

क्‍या देखा क्‍या भोगा तुमने आकर दुनियादारी में।
हाथ बंटाने वाले कम हैं दुखः की सांझेदारी में।।
हानि लाभ तलाशा जाता मदद के लेने देने में,
रिश्‍ते रोग विहीन रहे ना स्‍वार्थ की बीमारी में।
उसने उँचा मोल वसूला उसने वजन में कम तौला।
सब ने घाटा भरती करली अपनी अपनी बारी में।
अतुल त्‍याग मां का बेटों ने कर्जा मान उतारा तो,
फटा पुराना मां का आँचल फफक पड़ा लाचारी में,
रिश्‍तों का असतित्‍व बोध अब लेन देन से होता हैं,
लेनदेन क्‍या श्‍ोष भला रहता हैं टूटी यारी में।
जीवन रुपी नाम नकल मत पन्‍ने बरबाद करो,
नहीं वसूली हो पायेगी बेचा अगर उधारी में।
कृष्‍ण सुदामा का याराना इसी लिऐ मशहूर हुआ,
गर्जमंदको दे देने का सद्‌गुण था गिरधारी में,

खुशियां ले अंगड़ाई तो

खुशियां ले अंगड़ाई तो कब चुप रह पाते गीत।
दर्द उजागर हो जाते हैं गाते गाते गीत ॥
 पायल की झंकार बने कहीं खनक चूड़ियों की,
कभी तानपूरे की तानों को दोहराते गीत।
 रहन रखी मीठी यादों के बूढ़े हरकारे,
एक एक सिसकी से ही सौ सौ बन जाते गीत।
 कुछ गीत अकेलेपन के होठों पर आने वाले,
 सुनता देख किसी को अक्‍सर क्‍यों शरमाते गीत।
 अगर गुदगुदा जाय मौन को छंद अचानक ही,
 दिल की बात लबों पर आती वो कहलाते गीत।
 आँचल छोड़ के निकले थे तब कितने सुन्‍दर थे,
निखर गये हैं और यहां तक आते आते गीत।

दुनिया बड़ी निराली बाबा

खरपतवारें    पाली    बाबा।
अज़ब अनाड़ी माली बाबा॥
टिड्डे  बैठे  पात  पात पर ,
उल्‍लू  डाली  डाली  बाबा।
कुटिल बिल्‍लियां यहां दूध की,
करती हैं रखवाली बाबा।
दूनिया बड़ी निराली बाबा ,
अपनी देखी भाली बाबा।
भरी रहे र्निनाद हमेशा,
बजती हैं बस खाली बाबा।
कहां रखी रहन किसी ने ,
हर घर की खुशहाली बाबा।
पाचन तंत्र सुदृढ़ इतना कि ,
वो लेते नहीं जुगाली बाबा।
छलनी जैसी कर बैठेगा ,
वो अपनी ही थाली बाबा।
धवल वेश में छिपा रखी थी,
 कुत्‍सित काया काली बाबा।

जाने कैसी खबर

जाने कैसी खबर छप गयी है अब के अखबारों में।
 खौफज़दा है मची खलबली सारे इज्‍जतदारों में॥
 मंदिर मंदिर ढूंढ रहा हूं धूप बत्‍तियां लेकर मैं,
 दीनानाथ हुआ करता था इक तेरे अवतारों में।
 कभी कटोरा होता था उस हाथ में खंजर देखा तो,
पाप पुण्‍य पर बहस छिड़गयी धर्म के ठेकेदारों में।
 भरे पड़े भण्‍डार डॉलरों से फिर भूख से मरते क्‍यों,
रोटी खाकर चिंतन करते दरबारी दरबारों में।
नई गरीबी रेखा खिंची फुटपाथों की छाती पर,
मिटी गरीबी निर्धन सारे आ बैठे जरदारों में।
लाशों के अम्‍बार देखकर गिद्ध कराहकर बोले,
जीने का अधिकार भी शामिल हो मौलिक अधिकारों में।
आस पास जो बिखरा देखा वो कागज पे लिख डाला,
लोग तुझे क्‍यों शामिल करते‘‘जांगिड़''तंजनिगारों में।