रविवार, 17 सितंबर 2017

बीच अपने आज

बीच अपने आज भी ऐसे ठनी हैं
सब सुलह सम्भावनाएं अनमनी हैं॥
बन गई विपरीत सोचें ही वितण्डी,
समर्पण की गर्व से भौंहें तनी हैं
वन्चनाओं का किया विनिमय परस्पर,
मीत वो ही प्रीत कि अपराधिनी हैं।
अल्प वय की हूक की अनदेखियों की,
अब हर सजा स्मृतियों को झेलनी हैं।
हम कहां जाने के ख्वाहिशमंद थे,

औरजांगिडकौन सी राहें चुनी हैं।

देखता हूँ इन दिनों

देखता हूँ इन दिनों फिर लोग चिल्‍लाने लगे।
ये स्‍वर ललकार के कुछ जाने पहचाने लगे॥
 धन ने भी गिरगिट से सीखा हैं कोई हुनर जरूर,
काले गौरे  रंग इसके सामने आने लगे।
 फिक्र उनको मुल्‍क की होने लगी है आज फिर,
कुर्सी छिन जाने डर से शायद घबराने लगे।
 देश का पैसा अमानत मान रखवाले रहे,
अखबारों के आँकड़े़ पढ अब वो पछताने लगे।
 और कुछ खाने की कोई क्‍यों खबर आयी नहीं,
वो जुगाली ले रहे हैं, या कि सुस्‍ताने लगे।
 उनके झांसे में न आना वो बड़े मक्‍कार हैं,
बारी बारी आ के सारे मुझको समझाने लगे।
 जैसे भी मुमकिन हो समझोता करें हालात से,
जो न ऐसा कर सके वो लोग दीवाने लगे।

न जाने पुराने क्यों ख़त ढूंढते हो

न जाने पुराने क्यों ख़त ढूंढते हो
खतों में भी फिर दस्तखत ढूंढते हो।।
मकबूल शाइर हैं ग़ज़लों में इसकी,
नादां हो क्या,अदबीयत ढूंढते हो
किसी की ग़ज़ल में ही न जाने क्यूं
नयी कुछ न कुछ खासीयत ढूंढते हो 
ये दिक्कत तलब लफ्ज़ ले के ग़ज़ल में,
अब क्यों हेरां परेशां लुगत ढूंढते हो
चलन दौर का सारे लिखने लगे हैं,
खुदा जाने क्यों इल्मियत ढूंढते हो
मीटर,बहर,और ग़ज़ल जैसी चीजें.

ग़ज़लों में इनकी गलत ढूंढते हो। 

ख़बरें सुनी अनसुनी कर मत

ख़बरें सुनी अनसुनी कर मत,कर खबरों पर गौर मियां
रफ्ता रफ्ता आता लगता राम राज का दौर मियां
सहज सहन करने का सदगुण हो तो अपने जैसा हो,
अमन चैन कायम रखने के हैं हम ही सिरमौर मियां
दहशतगर्दी, नक्स्लियत की ताक़त का अन्दाजा क्या,
अक्सर जिनके आगे पड़ती सरकारें कमजोर मियां
शासन अनुशासन तो जैसे कैद किताबों में लगते
अपने अपने यहां तरीके हैं अपने बस तौर मियां
केवल क्यों कश्मीर में ही सैनिक अपमानित होतें हैं

भारत की भूमि पर होंगे कितने सूबे और मियां   

सोमवार, 8 अगस्त 2016

छंद : प्रिय छंद
बारह वर्ण बीस मात्राएँ
सूत्र : राजभा राजभा राजभा राजभा
ले गया चोर क्या क्या चुरा ले गया ।
लो फकीरों तुम्हारी मता ले गया । ।
गो ग़ज़ल शेर मिशरे चुराते सुने ,
वो समूंचा मुज़ल्ला चुरा ले गया ।
सरपरस्ती सियासत की है हासिल उसे ,
ना तभी तो खुदा से डरा ले गया ।
चोर पकड़ा गया था रंगे हाथ जो ,
वो बड़ा चोर आ के छुड़ा ले गया ।
काम की चीज थी या बिना काम की,
हाथ जो भी लगा वो उठा के गया ।
वो मुहाफ़िज़ अँधेरे का था शर्तिया ,
आखिरी रोशनी की शुआ ले गया ।
एक मफरूर से  लापता आदमी,
मांग के वो पता क्यों नया ले गया
तखलीक,तखईल और नजरियात,
पास मेरे यही था बचा ले गया                                
उसे तेशो खंज़र ओ तलवार दे।                                                   
काट दे वक्त की बेड़ियाँ बेहिचक,                                                    
खूबसूरत दी तस्वीर तो शुक्रिया,                                                     
बह गया प्यार शुब्हा  ए सैलाब में,                                                 
तू  मुझे हल,कलम और औजार दे।
 मेरी लेखनी को तो वो धार दे।
 इसे टांकने को कहीं दीवार दे ।
किसी दिल को तो तुख्में एतबार दे ।
मैं परश्तिश करूं न करूं क्या हुआ.
मेरे हक तो मुझे ए तरफदार दे ।
ना मुझे रोज आना पड़े मांगने,
बस एक बार में ही मददगार दे।
खुद बी खुद खेंच लुंगा लकीरें तो मैं.                                                  
हथेली बिन लकीरों की इस बार दे ।                                      

छंद-प्रिय छंद

छंद-प्रिय छंद
बारह वर्ण बीस मात्रा
सूत्र -राजभा राजभ राजभा राजभा
दोष तो दूसरों का बताते रहे
देश की दुर्दशा को छिपाते रहे ।।
वोट देते  गए  और माथा  धुना ,
चूक  वो  ही  सदा  दोहराते रहे
साख थी पीढ़ियों की बची थी जरा ,
वो  उसी को हमेशा  भुनाते  रहे
मोहरे  भी  गए  पेदलें  ना बची , 
और  वो  मात पे मात खाते रहे
झोंपड़े  निर्धनों  के उठाके वहीं ,
कोठियां ये किलों सी बनाते रहे
योजनाएं  बनी  घोषणाएं  हुई ,
जाल ही आंकड़ों के बिछाते रहे
आज भी हैं गरीबी वहीं की वहीं ,
खोखले भाषणों से लुभाते रहे